Friday, March 30, 2007

ध्यान


ध्यान कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं है। मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना और उसे विचारों के स्रोत्र से मुक्त कर देना ही 'ध्यान' हैं। ध्यान मन की एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को भीतरी चेतना के साथ जोड़ना है। ध्यान एक साधना है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर आत्मानन्द उपजाते हैं। केसर सब स्थानों पर उत्पन्न नहीं होता है; उसके लिए उपयुक्त स्थान खोजना होता है तथा एक विशेष पद्धति अपनाकर अथक परिश्रम करना होता है। हमें आत्मानंद उपजाने के लिए भी प्रयत्न (साधना) करना होगा। ध्यान-साधना आत्मानन्द-प्राप्ति का एक साधन है। ध्यान सम्पूर्ण मन के मौन के द्वारा उस अवस्थान्तर प्राप्त होने का साधना है, जो बुद्धि-ग्राह्य नहीं है। ध्यान के द्वारा मन अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव से अथवा बौद्धिक स्तर से ऊपर उठ जाता है। यह स्थिति कोई रिक्तता अथवा शून्यता नहींहै, बल्कि बुद्धि के व्यापार से मुक्त होकर उस से परे सूक्ष्म चेतना के सागर में प्रवाहित होना है, जो कि स्थूल जगत् के परे है। ब्रह्मसूत्र में "ध्यानाच्च" का भाष्य करते हुए शंकर कहते हैं कि एक प्रत्यय करना ही ध्यान होता है।आध्यात्मिक भूमिका में यह प्रवाह परमानन्द का प्रवाह है

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