Saturday, October 30, 2010

परमारथ के कारणे साधू धरियो शरीर

बात उस समय की हैं, जब पूज्यपाद सदगुरुदेव अपने संन्यास जीवन से संकल्पबद्ध होकर वापस अपने गृहस्थ संसार में लौटे थे. जब वे सन्यास जीवन के लिए ईश्वरीय प्रेरणा से घर से निकले थे, तो उनके पास तन ढकने के लिए एक धोती, एक कुरता और एक गमछा था. साथ में एक छोटे से झोले में एक धोती और कुरता अतिरिक्त रूप से था. इसके अलावा उनके पास और कुछ भी नहीं था. न ही कोई दिशा स्पष्ट थी और न ही कोई मंजिल स्पष्ट थी, केवल उनके हौसले बुलंद थे और ईश्वर में आस्था थी. यही उनकी कुल पूंजी थी, जिसके सहारे संघर्स्मय एवं इतने लम्बे जीवन की यात्रा पूरी करनी थी.

जब वे कुछ समय सन्यास जीवन में बिताकर वापस अपने गाँव लौटे, तो गाँव वाले, परिवार के लोग एवं क्षेत्र के सभी गणमान्य व्यक्ति उपस्थित हुए. सभी ने उनका सहर्ष स्वागत सत्कार किया, लेकिन सभी के मनोमस्तिष्क में यही गूंज रहा था कि इन्हें क्या मिला? हमें भी कुछ दिखाएं.जब यह प्रश्न सदगुरुदेव जी तक पहुंचा, तो वे बड़े ही प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि हमारी भी यही इच्छा हैं कि जो कुछ भी हमारे पास हैं वह मैं सभी को दिखाऊं.

गुरुदेव जी सभी के मध्य में खड़े हुए और अपना एक हाथ फैलाया और बताया कि जब मैं यहाँ से गया था तो मेरे पास यह था और हाथ की बंधी मुट्ठी को खोला तो उसमें कुछ कंकण निकले. उन्होंने बताया कि यही मेरे पास थे, जिन्हें मैं लेकर अपने साथ गया था और जो कुछ मैं लेकर लौटा हूँ, वह मेरी हाथ की दूसरी मुट्ठी में हैं. सभी लोग दूसरी मुट्ठी को देखने के लिए आतुर हो उठे. लेकिन गुरुदेव जी ने जब दूसरी मुट्ठी खोली तो सभी हैरत में पड गए. क्योंकि वह मुट्ठी बिलकुल ही खाली थी. सभी को आशा था कि इसमें कुछ अजूबा होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

गुरुदेव जी ने बताया कि जो कुछ मेरे पास था वह भी मैं गँवा कर आ रहा हूँ. मैं बिलकुल ही खाली होकर आ रहा हूँ. बिलकुल खाली हूँ, इसलिए अब जीवन में कुछ कर सकता हूँ. मैं अपने सन्यास जीवन में कोई जादू टोने टोटके सीखने नहीं गया था, हाथ सफाई की ये क्रियाएं यहाँ रहकर भी सीख सकता था, लेकिन मैं अपने जीवन में पूर्ण अष्टांग योग, सहित यम, नियम, आहार, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, के पूर्णत्व स्तर पर पहुँचाने के लिए ही यह सन्यास मार्ग चुना. अब मुझे इन कंकनो पत्थरों के भार को ढोना नहीं पड़ेगा, अगर ढोना नहीं पड़ेगा तो मैं स्वतंत्र होकर बहुत कुछ कर सकता हूँ. क्योंकि ज्ञान को धोने की जरुरत नहीं पड़ेगी, वह स्वयं ही उत्पन्न होता रहता हैं. स्वतः ही उसमें सुगंध आने लगती हैं. उसमें आनंद के अमृत की वर्ष होने लगती हैं  और वह तब तक नहीं प्राप्त हो सकता, जब तक हम इन कंकनों एवं पत्थरों को ढोते रहेंगे. अपने इस हाड-मांस को ढोने से कुछ नहीं होने वाला हैं, जब तक इसमें चेतना नहीं होगी. चेतना को पाने के लिए एकदम से खाली होना पड़ता हैं, सब कुछ गंवाना पड़ता हैं, सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता हैं. तब जाकर चेतना प्रस्फुटित होती हैं और तब उस प्रस्फुटित चेतना को दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं, बल्कि दुनिया उसे स्वयं देखती हैं, बार-बार देखती हैं, घुर-घूरकर देखती हैं. क्योंकि उसे इस हाड मांस में कुछ और ही दिखाई देता हैं, जिसे चैतन्यता कहते हैं. चेतना कहते हैं, ज्ञान कहते हैं. और उसे उस मुट्ठी में देखने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि वह मुट्ठी में समाने वाली चीज नहीं हैं, वह इस समस्त संसार में समाया हैं, जो सब कुछ सबको दिखाई दे रहा हैं.

Sunday, October 24, 2010

गुरु पादुका स्तोत्र

ॐ नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः!
आचार्य सिद्धेश्वरपादुकाभ्यो नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्यो!!1!!

मैं पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ, मेरी उच्चतम भक्ति गुरु चरणों और उनकी पादुका के प्रति हैं, क्योंकि गंगा -यमुना आदि समस्त नदियाँ और संसार के समस्त तीर्थ उनके चरणों में समाहित हैं, यह पादुकाएं ऐसे चरणों से आप्लावित रहती हैं, इसलिए मैं इस पादुकाओं को प्रणाम करता हु, यह मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, यह पूर्णता देने में सहायक हैं, ये पादुकाएं आचार्य और सिद्ध योगी के चरणों में सुशोभित रहती हैं, और ज्ञान के पुंज को अपने ऊपर उठाया हैं, इसीलिए ये पादुकाएं ही सही अर्थों में सिद्धेश्वर बन गई हैं, इसीलिए मैं इस गुरु पादुकाओं कोभक्ति भावः से प्रणाम करता हूँ!!1!!

ऐंकार ह्रींकाररहस्ययुक्त श्रींकारगूढार्थ महाविभूत्या!
ओंकारमर्म प्रतिपादिनीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!2!!


ये पादुकाएं "ऐंकार" रूप युक्त हैं, जो कि साक्षात् सरसवती के पुंज हैं, ये पादुकाएं "ह्रींकार" युक्त हैं, एक प्रकार से देखा जाये तो वे पूर्णरूपेण लक्ष्मी युक्त हैं, ये पादुकाएं "श्रींकार" युक्त हैं, जो संसार के समस्त वैभव, सम्पदा और सुख से युक्त हैं, जो सही अर्थों में महान विभूति हैं, ये पादुकाएं "ॐ" शब्द के मर्म को समझाने में सक्षम हैं,  शिष्यों को भी उच्च कोटि कि साधना सिद्ध कराने में सहायक हैं,  गुरुदेव के चरणों में लिपटी रहने वाली ये पादुकाएं साक्षात् गुरुदेव का ही विग्रह हैं, इसीलिए मैं इन पादुकाओं को श्रद्धा - भक्ति युक्त प्रणाम करता हूँ!!2!!

होत्राग्नि होत्राग्नि हविश्यहोतृ - होमादिसर्वाकृतिभासमानं !
यद् ब्रह्म तद्वोधवितारिणीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!3!!


ये पादुकाएं अग्नि स्वरूप हैं, जो मेरे समस्त पापो को समाप्त करने में समर्थ हैं, ये पादुकाएं मेरे नित्य प्रति के पाप, असत्य, अविचार, और अचिन्तन से युक्त दोषों को दूर करने में समर्थ हैं, ये अग्नि कि तरह हैं, जिनका पूजन करने से मेरे समस्त पाप एक क्षण में ही नष्ट हो जाते हैं, इनके पूजन से मुझे करोडो यज्ञो का फल प्राप्त होता हैं, जिसकी वजह से मैं स्वयं ब्रह्म स्वरुप होकर ब्रह्म को पहिचानने कि क्षमता प्राप्त कर सका हूँ, जब गुरुदेव मेरे पास नहीं होते, तब ये पादुकाएं ही उनकी उपस्थिति का आभास प्रदान कराती रहती हैं, जो मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं पूर्णता के साथ प्रणाम करता हूँ!!3!!

कामादिसर्प वज्रगारूडाभ्याम विवेक वैराग्यनिधिप्रदाभ्याम.
बोधप्रदाभ्याम द्रुतमोक्षदाभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!4!!


मेरे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार के सर्प विचरते ही रहते हैं, जिसकी वजह से मैं दुखी हूँ, और साधनाओं में मैं पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में गुरु पादुकाएं गरुड़ के समान हैं, जो एक क्षण में ही ऐसे कामादि सर्पों को भस्म कर देती हैं, और मेरे ह्रदय में विवेक, वैराग्य, ज्ञान, चिंतन, साधना और सिद्धियों का बोध प्रदान करती हैं, जो मुझे उन्नति की ओर ले जाने में समर्थ हैं, जो मुझे मोक्ष प्रदान करने में सहायक हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं प्रणाम करता हूँ!!4!!

अनंतसंसार समुद्रतार नौकायिताभ्यां स्थिरभक्तिदाभ्यां!
जाड्याब्धिसंशोषणवाड्वाभ्यां नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम!!5!!


यह संसार विस्तृत हैं, इस भवसागर पार करने में ये पादुकाएं नौका की तरह हैं, जिसके सहारे मैं इस अनंत संसार सागर को पार कर सकता हूँ, जो मुझे स्थिर भक्ति देने में समर्थ हैं, मेरे अन्दर अज्ञान की घनी झाडियाँ हैं, उसे अग्नि की तरह जला कर समाप्त करने में सहायक हैं, ऐसी पादुकाओं को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ!!5

Tuesday, October 19, 2010

दीक्षा

दीक्षा शब्द मूल रूप से चार शब्दों से बना हैं और यह शब्द हैं :

द+ई+क्ष+आ.

द : सद्यः कुंडली, शिवा, स्वस्तिक, जितेन्द्रिय.
ई : त्रिमूर्ति, महामाया, पुष्टि, विशुद्धि, शांति, शिवा - तुष्टि.
क्ष : क्रौध, संहार, महाक्षोभ, अनल - क्षय.
आ : प्रचण्ड, एकज, नारायण, क्रिया, काँटी.

“जीवन में जो शिव और शक्ति का संयुक्त रूप हैं, जो महामाया, तुष्टि एवं विशुद्धता की स्थिति हैं और जो जीवन के मलों का संहार कर जीवन में कान्ति उतपन्न करने की क्रिया हैं, वह दीक्षा ही हैं." या व्यक्ति को पूर्णत्व (नर से नारायण बनने की पद्धति) प्रदान करने की दुर्लभ प्रक्रिया ही दीक्षा हैं. दीक्षाओं के माध्यम से ही शिष्य को कृत्कृत्यता प्राप्त होती हैं. सदगुरु की करुणा तथा शिष्य की कृतज्ञता का यह पवन सम्मिलन दीक्षा की उदात्ततम परिणति हैं. भगवन कृष्ण को भी दीक्षाओं से संवलित गुरु की कलाओं ने महानतम बना दिया, संदीपन की दीक्षाओं ने उन्हें पुरुषोत्तम बना दिया, जगदगुरु बना दिया. श्रद्धा और समर्पण दीक्षाओं के मूलभूत अधर तत्व हैं, इनके द्वारा ही गुरु के ज्ञानामृत दोहन से आप्लावित होकर साधक अनंत सिद्धियों का स्वतः स्वामी बनता ही हैं. निश्चय ही वह व्यक्तित्व सौभाग्यशाली एवं धन्य होता हैं, जिसके जीवन में सदगुरु दीक्षाओं के लिए ऐसा क्षण उपस्थित कर दें.

दीयते इति सः दीक्षा.

"दीक्षा" का तात्पर्य यह नहीं हैं की इधर आपको दीक्षा दी और उधर आप सिद्ध हो गए या सफल हो गए, दीक्षा तो गुरु द्वारा प्रदत्त ऊर्जा से सफलता के निकटतम पहुँचने की क्रिया हैं, इसके बाद पूर्णता, सफलता, सिद्धि तो आपके विश्वास, श्रद्धा और व्यक्तिगत रूप से मानसिक एकाग्रता से मंत्र जप के द्वारा ही संभव हैं.

कोई भी साधना हो, दीक्षा प्राप्ति के उपरांत उसमें शिष्य के लिए करने को अधिक शेष नहीं रह जाता हैं, क्यूंकि सदगुरु अपनी ऊर्जा के प्रवाह द्वारा शिष्य के शारीर में वह शक्ति जाग्रत कर देते हैं, जिससे मनोवांछित सफलता प्राप्त हों और एक प्रकार से 90 प्रतिशत से भी अधिक सफलता तो साधक को यों ही एक झटके में मिल जाती हैं, जो शेष 10 प्रतिशत रह जाता हैं, उसमें साधक मंत्र - जप एवं साधना के द्वारा गुरु प्रदत्त ऊर्जा को संगृहीत करते हुए सफलता को हस्तगत कर ही लेता हैं.


प्रत्येक मनुष्य, जिसने जन्म लिया हैं उसके लिए सर्वथा उपयोगी हैं दीक्षा, क्योंकि दीक्षा शिष्य के जीवन को पावन बनाने की दुर्लभ क्रिया हैं.

हमारे कई - कई जन्मों के दोष, पाप एवं कुसंस्कारों के रूप में संकलित रहते हैं. इन्हीं दुःसंस्कारों से साधक को मुक्त करने के लिए दीक्षाएँ अपेक्षित हैं. गंदे कपड़े के मैल को बिलकुल निर्मूल करने के लिए जैसे कई बार कई प्रयास करने पड़ते हैं, वैसे ही कर दुःसंस्कारों को मिटने के लिए दीक्षा ही सबल उपाय हैं.
इसीलिए पाप मुक्त होने के लिए साधक द्वारा अनेक बार दीक्षा लेने का शास्त्रीय विधान हैं. दीक्षाओं के अनेक स्वरुप एवं प्रकार हैं, इसलिए आवश्यकतानुसार उनको लेने का प्रयास करते रहना चाहिए.

शिष्य के जीवन की यह एतिहासिक घटना होती हैं, कि सदगुरु उसे गुरु दीक्षा के माध्यम से अपना ले, ह्रदय से लगाकर अपने जैसा पावनतम बनाकर, एकाकार कर ले. केवल शिष्य के कान में गुरु मन्त्र फूंक देना ही गुरु दीक्षा नहीं होती. शिष्य के जीवन के पाप, ताप को समाप्त कर बंधन मुक्त करना, जन्म - म्रत्यु के चक्र से छुड़ा देना ही दीक्षा होती हैं, नर से नारायण बनाने की, पुरुष से पुरुषोत्तम बनाने की तथा मृत्यू से अमृत्यू की ऑर ले जाने की पावनतम क्रिया ही गुरु दीक्षा होती हैं. गुरु दीक्षा लेने के बाद तो यह सम्पूर्ण जीवन ही विकसित कमल पुष्प की तरह सम्मोहक, पूर्णमासी के चन्द्र सामान आह्लादक एवं अमर फल की तरह मधुर व रसपूर्ण होता ही हैं.

दीक्षा का महत्त्व इसलिए भी कई गुना बढ़ जाता हैं क्योंकि आजकल इस आपाधापी वाले युग में, इस तीव्र - गति से चलने वाले समय में हर कोई इस भाग - दौड़ में शामिल हैं और किसी में भी इतना संयम नहीं, और न ही किसी के पास इतना समय हैं की वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु साधनाओं में समय दे सके क्योंकि साधनाओं में लगातार कई दिनों तक साधक को पूर्ण मनोवेग के साथ जुटना पड़ता हैं.... और यह सब आज के युग में संभव नहीं......

आगे कुछ विशेष दीक्षाओं को स्पष्ट किया जायेगा, जिन्हें गुरु दीक्षा के बाद ग्रहण करना चाहिए. ये दीक्षाएँ पूर्णतः गोपनीय हैं आर गुरु - शिष्य परंपरा के अनुसार ही ये अभी तक गतिशील रह सकी हैं. इन दीक्षाओं द्वारा शिष्य जीवन में अपने प्रत्येक अभीष्ट की प्राप्ति कर सकता हैं.

Sunday, October 17, 2010

आने वाला समय तुमसे ये अवश्य पूछेगा

जीवन में ऊंचा उठना हैं और यदि नहीं उठते हैं तो यह जीवन व्यर्थ हैं, क्योंकि ऊंची सीढ़ी पर चढ़ना बहुत कठिन हैं, नीचे फिसलना बहुत आसान हैं ! दस सीढियों से नीचे उतरने में एक सेकंड लगता हैं, परन्तु दस सीढ़ी चढ़ने में आपको बीस सेकंड लगेंगे ! एक-एक सीढ़ी चढ़नी पड़ेगी, आपको नित्य बार-बार सोचना पड़ेगा कि :-

मैं शिष्य बन रहा हूँ या नहीं बन रहा हूँ ! क्या मेरे अन्दर राक्षस वृत्ति पनप रही हैं या सदगुणों का विकास हो रहा हैं? मेरा जीवन कैसा व्यतीत हो रहा हैं – अपने आप में विश्लेषण करना जीवन की श्रेष्ठता हैं, महानता हैं, और यह वह व्यक्ति कर सकता हैं, जो अपने आप में बिल्कुल शिष्यवत बनकर गुरु के पास रहने का सामर्थ्य रखता हैं, और शंकराचार्य कहते हैं, ऐसे ही व्यक्ति गुलाब के फूल बनते हैं, जो सही अर्थों में गुरु के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं !

शंकराचार्य कहते हैं जीवन का श्रेष्ठतम शब्द “शिष्य” हैं और शिष्य वह होता हैं जो अपनी जान को हथेली पर लेकर चलता हैं ! दो तरह के व्यक्ति होते हैं – एक व्यक्ति सदगुणों का आगार होता हैं, भंडार होता हैं, एक व्यक्ति षडयंत्र का भंडार होता हैं ! जो कि चौबीसों घंटे यही सोचता कि मैं कैसे छल करूँ? कैसे झूठ बोलूं? कैसे प्रपंच रचूं, कैसे इनको फुसलाऊं? कैसे इनमें फ़ुट डालूं? कैसे इन दोनों को लडाऊं? कैसे अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करूँ?

परन्तु शिष्य के चित्त पर इन सबका प्रभाव नहीं पड़ता, वे समझते हैं कि मैं क्या हूँ ! जो सही अर्थों में शिष्य हैं और जिनके अन्दर सदगुण हैं, वे असदगुणों को तुंरत भांप लेते हैं, जो गुलाब के फूलों के बीच रहते हैं, जब थोडी सी भी नाली कि दुर्गन्ध आती हैं तो वे भांप लेते हैं कि यहाँ दुर्गन्ध हैं, कहाँ से नाली बह रही हैं, यह मालूम नहीं, पर दुर्गन्ध हैं अवश्य, और उन्हें एहसास होता हैं कि उन्हें दुर्गन्ध से दूर हट जाना हैं !

ऐसा शिष्य या तो किनारा करके खड़ा हो जाता हैं या फिर उस सुगंध में स्वयं को व्याप्त करने के लिए तैयार हो जाता हैं ! मगर वह नाली का कीडा नहीं बनता, और नाली का कीडा बनकर हज़ार साल भी जीवित रहने की अपेक्षा दो दिन जीवित रहना ज्यादा अच्छा हैं ! वह अपने गुरु की रक्षा करने के लिए उनकी आज्ञा पालन करने के लिए, अपने जीवन को भी आत्मोत्सर्ग करने के लिए, वह तैयार रहता हैं – यही जीवन की श्रेष्ठता का एक मापदंड हैं !

यदि हमने गुरु के लिए अपने आप को न्यौछावर ही नहीं किया, तो जीवन व्यर्थ हैं ! जीवन में एक तरफ ऐसे व्यक्ति हैं जो गुरु हैं और जीवन में गुलाब के फूल तो चार पॉँच ही खिलेंगे और यदि चार पॉँच फूल भी टूट गए तो फिर कांटे ही जीवन में रह जायेंगे ! जहाँ भी जाओगे, तुम्हें कांटे ही मिलेंगे ! उन काँटों के बीच जीवित नहीं रहना हैं, क्योंकि अगर उन फूलों को जीवित रखना हैं तो उन काँटों को तोड़ना ही पड़ेगा, उन काँटों को तोडेंगे तो फूल विकसित होंगे, आसपास की घास खोदेंगे तो फूल का विकास होगा !

और हमने जीवन में काँटों का विकास किया, या फूलों का विकास किया, काँटों की रक्षा के लिए अपने क्षणों को व्यतीत किया या फूलों की रक्षा के लिए अपने क्षणों को व्यतीत किया, यह चिंतन का विषय हैं ! हमने अपने जीवन के कितने क्षण उस गुरु को दिए? कितना समय उनके लिए दिया? किस प्रकार से उनको बचाया? किस प्रकार से उनकी सेवा की, यह जीवन का एक उच्च स्तरीय सोपान हैं ! यह जीवन का एक उच्च स्तरीय मापदंड हैं, अपने आपको नापने की एक क्रिया हैं, और यही स्थिति शिष्यता कहलाती हैं ! शिष्य शब्द से ही सेवा शब्द बना हैं और सेवा का मतलब हैं उन गुलाब के फूलों को विकसित करने में सहयोग देना और सहयोग देने के लिए तूफ़ान आंधी के बीच में तन कर के खड़े हो जाना, क्योंकि अगर वे ही गिर गए तो चारों तरफ़ नाली के कीड़े बहने लग जायेंगे ! फिर हमारा जीवन अपने आप में व्यर्थ हो जाएगा, फिर हमारे जीवन का कोई अर्थ नहीं रह पायेगा !

मैंने तो सैकडों प्रकार के जीवन जीये हैं, गृहस्थ शिष्यों के बीच में भी रहा हूँ, सन्यासी शिष्यों के बीच भी रहा हूँ ! सन्यासियों में भी कई हलके स्तर के भी होंगे, कुछ बहुत अच्छे स्तर के भी हैं, जिनके नाम आज भी मेरे चित्त पर बहुत गहरी स्याही से लिखे हैं और और आज भी मैं उनके संपर्क में हूँ !

कृष्ण के भी तीर लगा तो उनको भी खून निकला ही निकला, राम को भी अगर रावण के तीर लगे तो उनके शरीर में भी कम से कम 108 छेद हो ही गए थे ! वह तो एक शरीर हैं, उस शरीर के अन्दर ईश्वरत्व हैं, उस शरीर के अन्दर गुरुत्व हैं, उस शरीर के अन्दर शिष्यत्व हैं !

आपने अपना जीवन किस तरीके से व्यतीत किया हैं और गुरु ने अपना जीवन किस तरीके से व्यतीत किया यह महत्वपूर्ण हैं ! क्या गुरु तुम्हारे बराबर सहयोगी रहे? क्या गुरु तुम्हें बार-बार प्रेम से बोलते रहे? क्या गुरु ने तुम्हें कभी गालियाँ दी? क्या गुरु ने तुमसे कभी षड़यंत्र किया? नहीं
किया! तो तुम्हें भी कोई अधिकार नहीं हैं कि उनके प्रति षडयंत्र करें, उनके प्रति झूठ बोलें, या उनके प्रति छल करें, उनके प्रति तूफ़ान को आने दें ! गुरु को मानसिक शांति मिले, यही हमारा धर्म काल गणना हो ! इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि जन्म से लेकर मृत्यु तक चाहे आप व्यापारी हैं,
चाहे नौकरी पेशा हैं, चाहे आप किसी भी क्षेत्र में हैं, आप शिष्य हैं !

मृत्यु के क्षण तक भी शिष्य हैं, शिष्य का अर्थ हैं कि आप क्या जीवन में सीख रहे हैं? आप क्या कर रहे हैं और आप किसके लिए क्या कर रहे हैं? क्या अपने लिए? हमने दूसरों के लिए क्या किया वह महत्वपूर्ण हैं !

अपने आपको बलिदान नहीं कर दिया तो शिष्य कैसे हुए? आगे भी चाहे गुरु तुम्हारे पास नहीं होगा, परन्तु वह सुगंध तुम्हारे पास व्याप्त होगी कि हमने कुछ क्षण ऐसे व्यक्ति के साथ बिताये हैं जिनमें ज्ञान था, चेतना थी, जो सही अर्थों में व्यक्तित्व था, मगर जिसे तूफानों के बीच धकेल दिया हमने !

और तूफ़ान के बीच तो अच्छे से अच्छा गुलाब भी मुरझाकर के टूटकर गिर जाता हैं, अच्छे से अच्छा राम भी बाणों का शिकार होकर गिर जाता हैं, अच्छे से अच्छा कृष्ण भी एक तीर लगने से मृत्यु को प्राप्त हो जाता हैं, लेकिन – नैनं
छिन्दन्ति शस्त्राणि… ! !

शंकराचार्य ने इस श्लोक में दूसरा शब्द लिया हैं प्रेम ! कि जिसके हृदय में प्रेम हैं वह गलती कर ही नहीं सकता ! और प्रेम केवल एक के साथ ही हो सकता हैं, दस लोगों के साथ नहीं हो सकता ! दस के साथ सहानुभूति हो सकती हैं, दस लोगों के साथ अटैचमेंट हो सकता हैं, चालीस लोगों के साथ परिचय आपका हो सकता हैं, प्रेम नहीं हो सकता ! प्रेम तो केवल एक व्यक्ति से होगा – या तो ईश्वर से होगा या गुरु से होगा या किसी से भी होगा और जिसके प्रति प्रेम हैं उसके प्रति जान न्यौछावर होती हैं ! भक्त अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर देता हैं !

आपका प्रेम केवल एक के साथ हो सकता हैं – या तो काँटों के साथ हो सकता हैं या गुलाब के फूलों के साथ हो सकता हैं ! दोनों से एक साथ नहीं हो सकता ! यह आप पर निर्भर हैं कि आप काँटों के साथ प्रेम करते कि आप गुलाब के साथ प्रेम करते हैं ! मगर शंकराचार्य कहते हैं कि अपने जीवन को उच्चता तक पहुचाने के लिए आपको इसी क्षण से परिवर्तित होना पड़ेगा या तो आप नीचे धरातल पर चले जायेंगे, या फिर ऊंचाई पर चले जायेंगे ! यह फिर आपके हाथ में हैं या तो आप षडयंत्रकारी बन जायेंगे या गुलाब के फूल बन जायेंगे या तो कांटे बन जायेंगे !

यह अपने आप में भगवान को धोखा देने की क्रिया हैं, अपने आप को धोखा देने की क्रिया हैं ! यदि आपके शरीर में सुगंध हैं आप में यदि प्रेम हैं तो आप वास्तव में उच्चता पर स्थित हैं ! प्रेम का अर्थ हैं अपने आप को मिटा देने की, फ़ना कर देने की क्रिया, उसके लिए अपने आपको न्यौछावर कर देने की क्रिया, तिल-तिल कर के जल जाने की क्रिया ! यदि ऐसा हैं तो जीवन की सार्थकता हैं !

इतिहास नहीं क्षमा करेगा, फिर तुम्हारे जीवन का अर्थ क्या रहेगा? यदि तुम्हारे जीवन का मूल्य क्या रहेगा? फिर तुम शिष्य कैसे बनोगे? शिष्य वह तो हैं ही नहीं कि दीक्षा दी वही शिष्य हैं ! यह तो जन्म से लगाकर के मृत्यु तक की सारी क्रिया शिष्यता हैं, आप सीढियों पर चढ़ रहे हैं या उतर रहे हैं – यह शिष्यता हैं, आप तूफानों से टक्कर ले रहे हैं या तूफानों का शिकार हो रहे हैं – यह शिष्यता हैं, आप मन्दिर को गिरता देख रहे हैं या मन्दिर को बचाने में तत्पर हैं, यह शिष्यता हैं ! आपने गिरजाघर को गिरने दिया या बचाया, आपने गुरुद्वारे को समाप्त किया या बचाया, यह शिष्यता
हैं !

और गुरु की पहिचान तो अपने आप में मन की आंखों से ही सम्भव हैं ! अगर प्रेम का अंकुर फुटा ही नहीं, तो आपने गुरु को पहचाना ही नहीं ! पहचान ले जिससे प्रेम का वह अंकुर तेजी से बढ़ने लगे क्योंकि तुम्हारे अन्दर प्रेम हैं तो परन्तु तुमने उसे जागने नहीं दिया हैं ! इसलिए जागने नहीं दिया कि उसके ऊपर घृणा, बहार की हवा, तूफ़ान हावी हो गए ! तुम भाग बन गए उसके, और उस प्रेम को तुमने दबा दिया ! ज्योंही अंधेरे को हटाया, छल को हटाया तो प्रेम का अंकुर फूटा, फूटा और तुम्हारा चेहरा मुस्कराहट से खिल गया, तुम्हारे शरीर से सुगंध निकलने लगी, तुम्हारा शरीर सुगन्धित, सुवासित होने लगा, एक महक आने लगी, एक आंखों में सुरूर पैदा हुआ, एक जिंदगी की धड़कन पैदा हुयी और उसकी रक्षा के लिए अपने आप को तैयार कर दिया, उसके लिए अपने आपको न्यौछावर कर दिया, उसके लिए अपने आपको आत्मोत्सर्ग कर दिया !

आपने क्या दिया, यह आपका अपना गणित हैं ! मैं आशीर्वाद देता हूँ कि आपके हृदय में प्रेम का अंकुर फूटे, आप किसी की ढाल बन सकें, आपके मन में जो घृणा दूसरो ने भर दी हैं, जो षडयंत्र, डर, भय, आतंक हैं उनको आप हटा कर निर्भीक हों ! आप निर्भीक है तो जीवित हैं, जाग्रत हैं, डरे हुए हैं तो आप
अधम, गये बीते हैं ! जब भय रहित होंगे तब प्रेम व्याप्त हो पायेगा ! ऐसे ही आप भय रहित, निर्भय होकर के अपने अन्दर के गुलाब को, प्रेम को विकसित करें और आप आत्मोत्सर्ग हो सकें और एक ज्ञान के दीप को, एक गुलाब के फूल को जीवित, जाग्रत, चैतन्य बनाएं रख सकें, जिससे कि वह सुगंध चारों तरफ फ़ैल सकें ! यही आपके जीवन की क्रिया बने, ऐसे ही मैं हृदय से आशीर्वाद देता हूँ, कल्याण कामना करता हूँ !

Thursday, October 14, 2010

गुरु आरती और उसकी व्याख्या

गुरु आरती मात्र शब्दों का लयबद्ध संयोजन नहीं वरन मंत्र हैं ह्रदय में सदगुरुदेव के स्थापन का पुकार हैं शिष्य के अंतस की 
"आर्त" शब्द से बना शब्द हैं "आरती", स्वयं में एक सम्पूर्ण साधना हैं आरती, रटे-रटाये शब्दों को दोहरा देने को ही नहीं कहते हैं आरती, आरती स्वयं में आर्तनाद होती हैं की गुरुदेव विवश हो जायें अपने शिष्यों के मध्य उपस्थित होने को …l आरती मंत्र में शिष्य पग धरा का आश्रय छोड़कर अनंत आकाश को पाने के लिए जो सदगुरुदेव का ही स्वरुप हैं उठ खड़ा होता हैं, हाथ आकाश की ओर तेजी से ऊपर की ओर उठने लगते हैं, तन-मन में गुनगुनाहट फ़ैल जाती हैं, आंखों में अश्रु धारा बहने लगती हैं, देह छटपटा उठती हैं l सदगुरुदेव से मिलन हेतु l गुरु आरती एक कर्म काण्ड नहीं हैं, यह तो हृदय में उठ रहे भावों की व्याख्या हैं, इन्हीं भावों को मानस में स्थापित करते हुए आरती करें हम प्रिय सदगुरुदेव की…… l l

जय गुरुदेव दयानिधि दीनन हितकारी l जय जय मोह विनाशक भव बंधन हारी!!1!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव l


अर्थात मैं जय घोष कर रहा हूँ अपने उन श्री सदगुरुदेव का जिनकी कृपा दृष्टि से मेरे जीवन में मुझे सर्वत्र विजय उपलब्ध हो रही हैं l वे स्वयं में दयानिधि हैं, कृपा करने के लिए निरंतर समुद्र की ही भांति उमड़ते रहते हैं l यदि उनका यह अकारण प्रमुदित होने का सहज गुण न होता तो क्यों वे मेरा उद्धार करके मुझे अपनी समीपता देते? मैं तो किसी पशु की तरह विभिन्न प्रकार के मोह रुपी कीचड़ में लोटता हुआ, व्यर्थ की भावनाओं रुपी खूंटे में उलझ कर गिरता - उठता, हास्यास्पद बन कर दैन्यता में अपने जीवन की इतिश्री मान चुका था l किंतु ऐसे ही अवसर पर जिन्होंने मेरा परम हितैषी बन मुझे जीवन के सत्य को समझाया, मैं उन श्री सदगुरुदेव की पुनः पुनः अभ्यर्थना करता हूँ l

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव गुरु मूरत धारी l वेद पुराण बखानत गुरु महिमा भारी!!2!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव l

अर्थात मैंने वेदों, पुराणों एवं अन्यान्य प्राचीन शास्त्रों के मध्यम से यह समझा हैं, मुझे इन ग्रंथों ने यह ज्ञान दिया हैं की यह सम्पूर्ण प्रकृति त्रिगुणात्मक हैं l इसी प्रकृति की सत शक्ति से ब्रह्मा सर्जन का कार्य करते हैं, विष्णु राज शक्ति के मध्यम से उसका पोषण करते हैं तथा तमो गुण का आश्रय लेकर भगवान् शिव समस्त पाप ताप दोष हरण का कार्य करते हैं किंतु ये तीनों ही गुण या शक्तियां जिस एक विग्रह में एक ही क्षण में समाहित होती हैं, वह विग्रह केवल श्री सदगुरुदेव का ही हो सकता हैं l केवल यही नहीं वरन जिन पुनीत ग्रंथों ने मुझे इस प्रकृति का रहस्य बताया हैं उन्हीं ग्रंथो का यह भी कथन हैं कइ जब भगवान् ब्रह्म, विष्णु या शिव को अपनी लीला का विस्तार करना होता हैं तब वे श्री सदगुरुदेव का ही आश्रय लेकर ही अपने कार्यों को संपादित कर पाते हैं और इस कथन में आश्चर्य ही क्यों और कैसा? हम शिष्यों ने जिस प्रकार से पग पग पर केवल एक ही नहीं वरन अनेकानेक शिष्यों को प्रतिपल श्री सदगुरुदेव द्वारा शिष्यों के गढ़ते, उनकी न्यूनताओं पर चोट करते और पोषण करते देखा हैं l उससे तो वास्तव में वे भगवान् ब्रह्म, विष्णु एवं शिव का समवेत रूप ही परिलक्षित हुए हैं l मैं ऐसे त्रिगुणमय और त्रिगुणातित श्री सदगुरुदेव की बार बार वंदना करता हूँ l

जप तप तीरथ संयम दान विविध कीजै! गुरु बिन ज्ञान न होवे, कोटि जातां कीजै!!3!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव

अर्थात धर्म के वर्तमान समय में अनेक रूप प्रचलित हैं; धर्म की अनेक अव्यख्यायें की जा रही हैं l कोई मंत्र जप को सर्वश्रेष्ठ कह रहा हैं तो कोई तीर्थ यात्रा करने को, किसी को भावना में शील-संयम का पालन करना ही धर्म हैं तो कोई दान-कल्याण के कार्य को ही धर्म का सर्वस्व मान रहा हैं l निःसंदेह ये सभी स्थितियां, ये सभी कार्य श्रेष्ठ हैं किंतु अन्ततोगत्वा ये उसी प्रकार की क्रियाएं हैं मानों किसी ने अपने घडे को धोकर मांजकर स्वच्छ तो कर लिया हैं किंतु केवल इतना करने से ही तो उसमें वह शीतल निर्मल जल नहीं भर सकता जो क्षुधा को तृप्त कर सके? यह देह भी एक घट ही हैं जो इन क्रियाओं से स्वच्छ तो हो जाती हैं किंतु इसमें ज्ञान रुपी जल तभी समाविष्ट हो सकता हैं जब दीक्षा के मध्यम से गुरु तत्व का समावेश हो सके l मैं कौन हूँ, मेरे जीवन का लक्ष्य क्या हैं, मेरा वह लक्ष्य किस प्रकार से प्राप्त हो सकेगा - इन्हीं बातों का रहस्य गुरु चरणों में बैठ कर समझना ही सही अर्थों में "ज्ञान" हैं क्योंकि इसी में शीतलता हैं, शेष सब बातें धर्म का, ज्ञान का आवरण भर ही हैं l मेरे जीवन में स्वयं की उपस्थिति से ज्ञान तत्व का बोध कराने वाले श्री सदगुरुदेव के चरणों में मेरा पुनः पुनः नमन l

माया मोह नदी जल जीव बहे सारे! नाम जहाज बिठा कर गुरु पल में तारे!!4!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव

अर्थात भविष्य का आता हुआ प्रत्येक क्षण, वर्तमान के क्षणों में बदलता हुआ तीव्रता से भूतकाल का एक अंग बन जाता हैं l काल के प्रवाह पर संभवतः किसी का कोई नियंत्रण नहीं, काल एक नदी के समान हैं और जिसमें प्रत्येक जीव फंसा हैं और इस नदी में जो उत्तुंग लहरें हैं वे हैं माया और मोह की जिनके धक्कों में फंस कर व्यक्ति कभी इस तट से टकराता हैं तो कभी उस तट से l कभी वह ईश्वर प्राप्ति के लिए व्यग्र होता हैं, तो कभी धन-संपदा, पड़ ऐश्वर्य के लिए और इस विचित्र सी स्थिति में जो सहायक होते हैं वे केवल श्री सदगुरुदेव ही होते हैं l वे अपना चिंतन, अपना बिम्ब, अपनी तेजस्विता का एक अंश देकर मानों तूफ़ान में फंसे किसी व्यक्ति को नौका प्रदान कर देते हैं l जिस तरह से नौका में बैठा व्यक्ति तटों से टकराने में अपने क्षणों को व्यर्थ नहीं करता वरन उन्हें निहारता हुआ अपनी यात्रा को सम्पूर्ण कर लेता हैं, ठीक उसी तरह से श्री सदगुरुदेव की शरण में आया जीव, जीवन के प्रति एक साक्षीभाव अपना कर निर्मल और निःसंशय हो जाता हैं l जीवन के गूढ़तम द्वंद्वों से मात्र एक क्षण में निकल लेने में समर्थ पूज्यपाद गुरुदेव का मैं सतत स्मरण करता हूँ, उनका जयघोष करता हूँ l

काम क्रोध मद मत्सर चोर बड़े भारी! ज्ञान खडग दे कर में गुरु सब संहारी!!५!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव l

अर्थात मेरा यह शरीर जो वास्तव में ईश्वर की और से दिया गया एक उपहार हैं, धर्म कार्यों को पूर्ण करने की एक साधना हैं l इनमें दस द्वार भी हैं और मैं भले ही कितना ही सजग क्यों न रहूँ, इनसे विविध चोर - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर्य (ईर्ष्या) प्रवेश कर ही जाते हैं l ये मेरी जीवनी शक्ति, मेरी प्राण ऊर्जा को खींच कर, इन्हें मुझसे छिनकर स्वयं का पोषण करते हैं l मैं स्वयं में इनसे संघर्ष करने में अपने आप को असमर्थ सा अनुभव करने लग गया हूँ, क्योंकि मैं यह समझ ही नहीं पता की ये कब मेरे अन्दर प्रविष्ट हुए और जब तक समझता हूँ तब तक ये सबल हो चुके होते हैं l ऐसी विकत स्थिति में मेरा आश्रय एकमात्र गुरुदेव ही हैं, जिन्होंने मुझे समय- समय पर ज्ञान रुपी तलवार देकर वह चेतना दी हैं जिससे मैं आत्म विश्लेषण करता हुआ पुनः पुनः निर्मल हो सका हूँ l यह मेरे पूज्य श्री सदगुरुदेव का जो अग्नि स्फुल्लिंग सदृश्य शिव स्वरुप हैं, जिसे मैं आज तक केवल अपने दुर्गुण रुपी विष ही भेंट कर सका हूँ, उसे मैं हृदय से उमड़े निर्मल गंगधारा जैसे अश्रुओं से भी अभिसिक्त कर देना चाहता हूँ l

नाना पंथ जगत में निज निज गुण गावै! सबका सार बता कर गुरु मार्ग लावै!!6!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव!

अर्थात मैंने ज्ञान प्राप्ति के लिए आज तक केवल उन जड़ ग्रंथों का ही अध्ययन किया हैं, जिनमें कोई कहता हैं कि जीवन और ब्रह्म दो हैं, तो कोई कहता हैं कि दोनों अभिन्न हैं, कोई कहता हैं कि वह परम तत्व केवल भक्ति के द्वारा ही उपलब्ध हैं तो किसी के मत में वह नाक दबाकर साँस खींचने और छोड़ने की क्रिया द्वारा ही प्राप्त हो सकता हैं l यह मेरी मूढ़ता ही थी कि मैं मात्र बुद्धि का पोषण करने वाले इन ग्रंथों के जाल में वर्षों तक अपने क्षण व्यर्थ करता रहा और जीवंत गुरु के चरणों में नहीं बैठ सका किंतु गुरुदेव अब आपके ही कृपा कटाक्ष से मैं समस्त भ्रमजाल को काटकर आप तक पहुँच सका हूँ और आपने अत्यन्त सहजता से समस्त ज्ञान-विज्ञान को जिस एक शब्द में समेत दिया हैं अब वही पथ भी हैं और पथप्रदर्शक भी और वह शब्द हैं - गुरु, गुरु और केवल गुरु! जो केवल जीवंत ही नहीं, जीवन की सम्पूर्ण व्याख्या हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव का अनुसरण कर मैं इस मां के गर्भ से चिता तक सीमित यात्रा को वास्तव में जीवन बना लेना चाहता हूँ l मैं जयघोष के मध्यम से अपने प्राणों में निरंतर ऊर्जा का संचार होते अनुभव भी कर रहा हूँ l

"गुरु चरणामृत निर्मल सब पातक हारी! वचन सुनत श्री गुरु के सब संशय हारी!!7!!"
ॐ जय जय जय गुरुदेव l

"अर्थात् मैं अपने श्री सदगुरुदेव के चरणों में केवल इस संसार की विषमता, वैमनस्यता और पीड़ा से छिपने का एक स्थान ही नहीं देखता, मुझे वहां काशी और कन्याकुमारी के भी दर्शन हो जाते हैं, मुझे ऐसा लगता हैं की मानों मैं ही नहीं यहाँ समस्त देवी-देवता भी आश्रय पाने के लिए दौड़े चले आए हैं और इस संस्पर्श से मैं स्वयं को निर्मल होता हुआ अनुभव करने लग गया हूँ l मुझे ऐसा लगने लगा हैं की निश्चय ही मैं सौभाग्यशाली हूँ, स्वयं में धन्य- धन्य हूँ, जो मैंने जीवन में ऐसे देव दुर्लभ क्षणों के साक्षात् किए l इसके पश्चात् भी मेरे मन में जो संशय, तर्क-कुतर्क था वह श्री सदगुरुदेव के श्रीमुख से आशीर्वचन सुनकर सदा-सर्वदा के लिए विनष्ट हो चुका हैं l पूज्यपाद गुरुदेव के चरणों में बैठकर मैंने जिस ज्ञान के अमृत को पिया हैं, वही वास्तव में चरनामृत हैं और इसने मुझे इस पाप चिंतन के दोष से मुक्त कर दिया हैं की मैं दीन-हीन, दुर्बल और पतित हूँ l अशुभ का चिंतन ही सबसे बड़ा अशुभ हैं, मुझे ऐसा जीवन मर्म समझाने वाले पूज्यपाद गुरुदेव के चरणों में मेरा सतत प्रणाम!"

"तन मन धन सब अर्पण गुरु चरनन कीजै! ब्रह्मानंद परम पद मोक्ष गति दीजै!!8!!
ॐ जय जय जय गुरुदेव"

"अर्थात् मेरा यह शरीर, मेरा मन और मेरी समस्त संपदा सब कुछ गुरु कृपा से ही उत्पन्न हुयी हैं और उन्हीं में विलय हो रही हैं l मैं इन सभी का स्वामी नहीं अपितु एक ट्रस्टी भर ही हूँ जिसका कार्य इस सम्पदा की सुरक्षा करने का हैं जो मेरे जीवन के लिए अति आवश्यक हो तथा मेरे जीवन के लिए कब क्या अति आवश्यक हैं, इसका भी ज्ञान मैं श्री सदगुरुदेव से प्राप्त करने का इच्छुक हूँ l मैं व्यर्थ की तृष्णाओं, कामनाओं और वासनाओं में उलझ कर अपने जीवन के क्षण निरर्थक द्वंद्वों में नहीं व्यतीत करना चाहता l गुरु के पास आने में किसका स्वार्थ नहीं होता? किंतु मैं वह बड़ा स्वार्थ रखता हूँ, उस स्थिति को प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे कहीं ब्रह्मानंद, कहीं परमानंद तो कहीं मोक्ष कहा गया हैं l मैं जीवन में गति चाहता हूँ, सुमति चाहता हूँ और अंत में सदगति चाहता हूँ l गुरुदेव! मैं पुनः पुनः आपका जयघोष, एक हुंकार के साथ कर रहा हूँ क्योंकि इसी हुंकार से, इसी जयघोष से मुझे स्मरण बना रहता हैं की मैं किस अद्वितीय युग पुरूष का शिष्य हूँ l यही गर्व बोध मेरे समस्त जीवन का आधार हैं l"

वस्तुतः गुरु आरती की यह व्याख्या भी स्वयं में सम्पूर्ण नहीं हैं क्योंकि "गुरु" को कुछ शब्दों या वाक्यों में समेट जा ही नहीं सकता l यह तो एक विनम्र प्रयास भर ही हैं l

Wednesday, October 13, 2010

16 कलाये

1. वाक् सिद्धि : जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं!



1. दिव्य दृष्टि: दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं!



1. प्रज्ञा सिद्धि : प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें!



1. दूरश्रवण : इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता!



1. जलगमन : यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो!



1. वायुगमन : इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं!



1. अदृश्यकरण : अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं!



1. विषोका : इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं!



1. देवक्रियानुदर्शन : इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं!



1. कायाकल्प : कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव तोग्मुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं!



1. सम्मोहन : सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं!



1. गुरुत्व : गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं!



1. पूर्ण पुरुषत्व : इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की!



1. सर्वगुण संपन्न : जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं!



1. इच्छा मृत्यु : इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं!



1. अनुर्मि : अनुर्मि का अर्थ हैं-जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो!



यह समस्त संसार द्वंद्व धर्मों से आपूरित हैं, जितने भी यहाँ प्राणी हैं, वे सभी इन द्वंद्व धर्मों के वशीभूत हैं, किन्तु इस कला से पूर्ण व्यक्ति प्रकृति के इन बंधनों से ऊपर उठा हुआ होता हैं!