Tuesday, October 19, 2010

दीक्षा

दीक्षा शब्द मूल रूप से चार शब्दों से बना हैं और यह शब्द हैं :

द+ई+क्ष+आ.

द : सद्यः कुंडली, शिवा, स्वस्तिक, जितेन्द्रिय.
ई : त्रिमूर्ति, महामाया, पुष्टि, विशुद्धि, शांति, शिवा - तुष्टि.
क्ष : क्रौध, संहार, महाक्षोभ, अनल - क्षय.
आ : प्रचण्ड, एकज, नारायण, क्रिया, काँटी.

“जीवन में जो शिव और शक्ति का संयुक्त रूप हैं, जो महामाया, तुष्टि एवं विशुद्धता की स्थिति हैं और जो जीवन के मलों का संहार कर जीवन में कान्ति उतपन्न करने की क्रिया हैं, वह दीक्षा ही हैं." या व्यक्ति को पूर्णत्व (नर से नारायण बनने की पद्धति) प्रदान करने की दुर्लभ प्रक्रिया ही दीक्षा हैं. दीक्षाओं के माध्यम से ही शिष्य को कृत्कृत्यता प्राप्त होती हैं. सदगुरु की करुणा तथा शिष्य की कृतज्ञता का यह पवन सम्मिलन दीक्षा की उदात्ततम परिणति हैं. भगवन कृष्ण को भी दीक्षाओं से संवलित गुरु की कलाओं ने महानतम बना दिया, संदीपन की दीक्षाओं ने उन्हें पुरुषोत्तम बना दिया, जगदगुरु बना दिया. श्रद्धा और समर्पण दीक्षाओं के मूलभूत अधर तत्व हैं, इनके द्वारा ही गुरु के ज्ञानामृत दोहन से आप्लावित होकर साधक अनंत सिद्धियों का स्वतः स्वामी बनता ही हैं. निश्चय ही वह व्यक्तित्व सौभाग्यशाली एवं धन्य होता हैं, जिसके जीवन में सदगुरु दीक्षाओं के लिए ऐसा क्षण उपस्थित कर दें.

दीयते इति सः दीक्षा.

"दीक्षा" का तात्पर्य यह नहीं हैं की इधर आपको दीक्षा दी और उधर आप सिद्ध हो गए या सफल हो गए, दीक्षा तो गुरु द्वारा प्रदत्त ऊर्जा से सफलता के निकटतम पहुँचने की क्रिया हैं, इसके बाद पूर्णता, सफलता, सिद्धि तो आपके विश्वास, श्रद्धा और व्यक्तिगत रूप से मानसिक एकाग्रता से मंत्र जप के द्वारा ही संभव हैं.

कोई भी साधना हो, दीक्षा प्राप्ति के उपरांत उसमें शिष्य के लिए करने को अधिक शेष नहीं रह जाता हैं, क्यूंकि सदगुरु अपनी ऊर्जा के प्रवाह द्वारा शिष्य के शारीर में वह शक्ति जाग्रत कर देते हैं, जिससे मनोवांछित सफलता प्राप्त हों और एक प्रकार से 90 प्रतिशत से भी अधिक सफलता तो साधक को यों ही एक झटके में मिल जाती हैं, जो शेष 10 प्रतिशत रह जाता हैं, उसमें साधक मंत्र - जप एवं साधना के द्वारा गुरु प्रदत्त ऊर्जा को संगृहीत करते हुए सफलता को हस्तगत कर ही लेता हैं.


प्रत्येक मनुष्य, जिसने जन्म लिया हैं उसके लिए सर्वथा उपयोगी हैं दीक्षा, क्योंकि दीक्षा शिष्य के जीवन को पावन बनाने की दुर्लभ क्रिया हैं.

हमारे कई - कई जन्मों के दोष, पाप एवं कुसंस्कारों के रूप में संकलित रहते हैं. इन्हीं दुःसंस्कारों से साधक को मुक्त करने के लिए दीक्षाएँ अपेक्षित हैं. गंदे कपड़े के मैल को बिलकुल निर्मूल करने के लिए जैसे कई बार कई प्रयास करने पड़ते हैं, वैसे ही कर दुःसंस्कारों को मिटने के लिए दीक्षा ही सबल उपाय हैं.
इसीलिए पाप मुक्त होने के लिए साधक द्वारा अनेक बार दीक्षा लेने का शास्त्रीय विधान हैं. दीक्षाओं के अनेक स्वरुप एवं प्रकार हैं, इसलिए आवश्यकतानुसार उनको लेने का प्रयास करते रहना चाहिए.

शिष्य के जीवन की यह एतिहासिक घटना होती हैं, कि सदगुरु उसे गुरु दीक्षा के माध्यम से अपना ले, ह्रदय से लगाकर अपने जैसा पावनतम बनाकर, एकाकार कर ले. केवल शिष्य के कान में गुरु मन्त्र फूंक देना ही गुरु दीक्षा नहीं होती. शिष्य के जीवन के पाप, ताप को समाप्त कर बंधन मुक्त करना, जन्म - म्रत्यु के चक्र से छुड़ा देना ही दीक्षा होती हैं, नर से नारायण बनाने की, पुरुष से पुरुषोत्तम बनाने की तथा मृत्यू से अमृत्यू की ऑर ले जाने की पावनतम क्रिया ही गुरु दीक्षा होती हैं. गुरु दीक्षा लेने के बाद तो यह सम्पूर्ण जीवन ही विकसित कमल पुष्प की तरह सम्मोहक, पूर्णमासी के चन्द्र सामान आह्लादक एवं अमर फल की तरह मधुर व रसपूर्ण होता ही हैं.

दीक्षा का महत्त्व इसलिए भी कई गुना बढ़ जाता हैं क्योंकि आजकल इस आपाधापी वाले युग में, इस तीव्र - गति से चलने वाले समय में हर कोई इस भाग - दौड़ में शामिल हैं और किसी में भी इतना संयम नहीं, और न ही किसी के पास इतना समय हैं की वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु साधनाओं में समय दे सके क्योंकि साधनाओं में लगातार कई दिनों तक साधक को पूर्ण मनोवेग के साथ जुटना पड़ता हैं.... और यह सब आज के युग में संभव नहीं......

आगे कुछ विशेष दीक्षाओं को स्पष्ट किया जायेगा, जिन्हें गुरु दीक्षा के बाद ग्रहण करना चाहिए. ये दीक्षाएँ पूर्णतः गोपनीय हैं आर गुरु - शिष्य परंपरा के अनुसार ही ये अभी तक गतिशील रह सकी हैं. इन दीक्षाओं द्वारा शिष्य जीवन में अपने प्रत्येक अभीष्ट की प्राप्ति कर सकता हैं.

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