Monday, November 08, 2010

गुरु वाणी

शिष्य
शिष्य के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती हैं गुरु के हृदय पर अपना नाम अंकित कर देना. जब यह हो जाता हैं तो गुरु और शिष्य में कोई भेद ही नहीं रहता क्यूंकि फिर गुरु का समस्त ज्ञान स्वत: शिष्य के ह्रदय में उतर जाता हैं.

समर्पण
गुरु तो प्रदान करने के लिए हर क्षण तत्पर हैं परन्तु वह स्वयं से कुछ प्रदान कर नहीं सकता जब तक की शिष्य स्वयं आगे बढ़कर अपने आप को समर्पित न कर दे.

गुरु सेवा
गुरु सेवा से बड़ी संसार में कोई साधना नहीं. इसके आगे तो सभी मंत्र, सब साधनाये, सब भक्ति, सब क्रियाये व्यर्थ हैं. गुरु सेवा के द्वारा शिष्य क्षण मात्र में वह सब प्राप्त कर लेता हैं जो की हजारों वर्ष क्या कई जन्मों की तपस्या के बाद भी संभव नहीं.

कायरता
"मुझे ऐसे शिष्यों की आवश्यकता नहीं हैं, जिनमें कायरता हो, विरोध सहने की क्षमता न हो. जो जरा सी विपरीत स्थिति प्राप्त होते ही विचलित हो जाते हो. मुझे तो वे शिष्य प्रिय हैं, जिनमें बाधाओं को ठोकर मरने का हौसला होता हैं. जो विपरीत परिस्थितियों पर छलांग लगाकर भी मेरी आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करने की क्रिया करते हैं, जो समस्त बंधनों को झटक कर भी मेरी आवाज़ को सनते हैं.... और ऐसे शिष्य स्वत: ही मेरी आत्मा का अंश बन जाते हैं, उनका नाम स्वत: ही मेरे होंठों से उच्चरित होने लगता हैं और वे मेरे ह्रदय की गहराइयों में उतर जाते हैं. वास्तव में जो दृढ निश्चयी होते हैं, वे समाज को ठोकर मार कर, सभी बंधनों को तोड़ते हुए एवं सभी बाधाओं को पर करते हुए गुरु चरणों का सानिध्य प्राप्त कर ही लेते हैं और सेवा व साधनों को अपने जीवन में स्थान देकर परम सत्य के मार्ग पर गतिशील हो जाते हैं.

आनंद का बीज बोना हैं
मैं अपने पुरे जीवन में बांटता चला गया आनंद के वे बीज, अपने शिष्य के बिच, बहुतों ने इसे परखने का प्रयास किया सोचा की इससे हम सब प्राप्त कर लेंगे, और जो भौतिक इच्छाएं हैं वे पूरी हो जाएँगी और इस तरह अपनी इच्छाओं का आकाश बढ़ते चले गए, बहुत कम शिष्यों ने सोचा की गुरुदेव ने जो आनंद का यह बीज दिया हैं, इसे तो ह्रदय के भीतर उगाना हैं, जो अनुभूति दी हैं अपने पुरे शरीर में विस्तार कर पल - पल आनंद अनुभव करना हैं, न की भटकना हैं इधर - उधर. गुरुदेव की आवाज़ के साथ अपने मन के आनंद के भाव को उनके विचारों के साथ समाहित कर देना हैं, और मेरे वे शिष्य बहुत बड़ी जिम्मेदारी लेते हुए भी आनंद से सराबोर हैं, क्योंकि उनके कार्यों में निश्चलता हैं, एक समर्पण हैं, लेन - देन का कोई भाव नहीं हैं.

मेरे साथ चलना हैं
मेरे साथ चलना हैं तो जीवन में तुम्हें अपना द्रष्टिकोण बदलना पड़ेगा, जो विचार तुम्हारे भीतर भरे हुए हैं, कर सबको निकलकर शून्य की स्थिति उत्पन्न करनी होगी, तभी तो तुम आनंद का अनुभव कर सकोगे, किसी भी यात्रा पर चलने के लिए तैयार हो सकोगे, और मैं भी विश्वास के साथ यह देख सकूँगा की अब यह शिष्य तैयार हैं, अब यह शिष्य कायर नहीं हैं, अब यह शिष्य अपनी शक्ति को, अपने लक्ष्य को, अपने आनंद को पहिचान गया हैं और इसे कार्य दिया जा सकता हैं, इसे विचार दिए जा सकते हैं, जो सीधे उसके ह्रदय में स्थान बनायेंगे न की तर्क - वितर्क करते हुए मस्तिष्क में ही मापतौल करेंगे. तुमने एक शरीर को गुरु मान लिया हैं, गुरु तो वह तत्व हैं,  जिससे जुड़कर तुम उन आयामों को स्पर्श कर सकते हो, जिनको शाश्त्रों ने पूर्णमिदः पूर्णमिदं कहा हैं! उसके लिए गुरु के शरीर को बांहों में लेने की जरुरत नहीं! आवश्यकता हैं की तुम अपना मन उनके चरण कमलों में समर्पित करो…. और वह हो पायेगा केवल और केवल मात्र गुरु सेवा से और गुरु मंत्र जप से!