Tuesday, December 28, 2010

मंत्र जप के प्रभाव

z mantra
जब तक किसी विषय वस्तु के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं होती तो व्यक्ति वह कार्य आधे अधूरे मन से करता है और आधे-अधूरे मन से किये कार्य में सफलता नहीं मिल सकती है| मंत्र के बारे में भी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है, मंत्र केवल शब्द या ध्वनि नहीं है, मंत्र जप में समय, स्थान, दिशा, माला का भी विशिष्ट स्थान है| मंत्र-जप का शारीरिक और मानसिक प्रभाव तीव्र गति से होता है| इन सब प्रश्नों का समाधान आपके लिये -

जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को 'मंत्र' कहते हैं| किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही 'मंत्र-जप' कहलाता है, लेकिन प्रश्न यह उठता है, कि वास्तव में मंत्र जप क्या है? जप से क्या परिणाम होते निकलता है?

व्यक्त-अव्यक्त चेतना

१. व्यक्त चेतना (Conscious mind). २. अव्यक्त चेतना (Unconscious mind).
हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं| अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएं, गुप्त भावनाएं इत्यादि विद्यमान हैं| व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यंत शक्तिशाली है| हमारे संस्कार, वासनाएं - ये सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं|

किसी मंत्र का जब ताप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है| मंत्र में एक लय (Rythm) होता है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है| मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नाड़ियों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगाती है|

मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं -
१. मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological effect)
२. ध्वनि प्रभाव (Sound effect)

मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ने से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है| मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना| इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया शक्ति भी तीव्र बन जाति है, जिसके परिणाम स्वरुप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है| मंत्र अचूक होते हैं तथा शीघ्र फलदायक भी होते हैं|

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उछ रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं| मंत्र जप का साइड इफेक्ट (Side Effect) यही है|
मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दिम करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है|
"क्लीं ह्रीं" इत्यादि बीजाक्षरों का एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर ह्रदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व् उनके विकार नष्ट होते हैं|

जप के लिये ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शान्ति पूर्ण रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहर या शोर नहीं होता| कुछ विशिष्ट साधनाओं के लिये रात्रि का समय अत्यंत प्रभावी होता है| गुरु के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए| सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है|

अपूर्व आभा
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे से एक अपूर्व आभा आ जाति है| आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वास्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तो इसके परिणाम स्वरुप मुखमंडल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही|

जप माला
जप करने के लिए माला एक साधन है| शिव या काली के लिए रुद्राक्ष माला, हनुमान के लिए मूंगा माला, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टे की माला, गुरु के लिए स्फटिक माला - इस प्रकार विभिन्न मंत्रो के लिए विभिन्न मालाओं का उपयोग करना पड़ता है|

मानव शरीर में हमेशा विद्युत् का संचार होता रहता है| यह विद्युत् हाथ की उँगलियों में तीव्र होता है| इन उँगलियों के बीच जब माला फेरी जाती है, तो लयात्मक मंत्र ध्वनि (Rythmic sound of the Hymn) तथा उँगलियों में माला का भ्रमण दोनों के समन्वय से नूतन ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है|

जप माला के स्पर्श (जप के समय में) से कई लाभ हैं -
* रुद्राक्ष से कई प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं|
* कमलगट्टे की माला से शीतलता एव अआनंद की प्राप्ति होती है|
* स्फटिक माला से मन को अपूर्व शान्ति मिलती है|

दिशा
दिशा को भी मंत्र जप में आत्याधिक महत्त्व दिया गया है| प्रत्येक दिशा में एक विशेष प्रकार की तरंगे (Vibrations) प्रवाहित होती रहती है| सही दिशा के चयन से शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है|

जप-तप
जप में तब पूर्णता आ जाती है, पराकाष्टा की स्थिति आ जाती है, उस 'तप' कहते हैं| जप में एक लय होता है| लय का सरथ है ध्वनि के खण्ड| दो ध्वनि खण्डों की बीच में निःशब्दता है|  इस  निःशब्दता पर मन केन्द्रित करने की जो कला है, उसे तप कहते हैं| जब साधक तप की श्तिति को प्राप्त करता है, तो उसके समक्ष सृष्टि के सारे रहस्य अपने आप अभिव्यक्त हो जाते हैं| तपस्या में परिणति प्राप्त करने पर धीरे-धीरे हृदयगत अव्यक्त नाद सुनाई देने लगता है, तब वह साधक उच्चकोटि का योगी बन जाता है| ऐसा साधक गृहस्थ भी हो सकता है और संन्यासी भी|

कर्म विध्वंस
मनुष्य को अपने जीवन में जो दुःख, कष्ट, दारिद्य, पीड़ा, समस्याएं आदि भोगनी पड़ती हैं, उसका कारण प्रारब्ध है| जप के माध्यम से प्रारब्ध को नष्ट किया जा सकता है और जीवन में सभी दुखों का नाश कर, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है, इष्ट देवी या देवता का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है|

गुरु उपदेश
मंत्र को सदगुरू के माध्यम से ही ग्रहण करना उचित होता है| सदगुरू ही सही रास्ता दिखा सकते हैं, मंत्र का उच्चारण, जप संख्या, बारीकियां समझा सकते हैं, और साधना काल में विपरीत परिश्तिती आने पर साधक की रक्षा कर सकते हैं|

साधक की प्राथमिक अवशता में सफलता व् साधना की पूर्णता मात्र सदगुरू की शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होती है| यदि साधक द्वारा अनेक बार साधना करने पर भी सफलता प्राप्त न हो, तो सदगुरू विशेष शक्तिपात द्वारा उसे सफलता की मंजिल तक पहुंचा देते हैं|

इस प्रकार मंत्र जप के माध्यम से नर से नारायण बना जा सकता है, जीवन के दुखों को मिटाया जा सकता है तथा अदभुद आनन्द, असीम शान्ति व् पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि मंत्र जप का अर्थ मंत्र कुछ शब्दों को रतना है, अपितु मंत्र जप का अर्थ है - जीवन को पूर्ण बनाना|

Friday, December 24, 2010

गुरु - शिष्य का पारस्परिक संबंध

अयोग्य व्यक्ति ( दुर्गुणों से युक्त ) न तो गुरु से दीक्षा पाने का अधिकारी है और न ही वह दीक्षित होने पर साधना के क्षेत्र में कोई उपलब्धि ही हासिल कर पाता है । यही कारण है कि प्रायः संत - महात्मा हरेक किसी को शिष्य नहीं बनाते । कुपात्रजनों को दिया जाने वाला ज्ञानोपदेश , आध्यात्मिक - संकेत , साधना - परामर्श और मंत्र - दीक्षा आदि सब निरर्थक होते हैं ।

गुरु और शिष्य के बीच पारस्परिक संबंध बहुत शुचिता और परख के आधार पर स्थापित होना चाहिए , तभी उसमें स्थायित्व आ पाता है । इसलिए गुरुजनों को भी निर्दिष्ट किया गया है कि वे किसी को शिष्य बनाने , उसे दीक्षा देने से पूर्व उसकी पात्रता को भली - भांति परख लें । शास्त्रों का कथन हैं -

मंत्री द्वारा किए गए दुष्कृत्य का पातक राजा को लगता है और सेवक द्वारा किए गए पाप का भागी स्वामी बनता है । स्वयंकृत पाप अपने को और शिष्य द्वारा किए गए अपराध का पाप गुरु को लगता है ।

दीक्षा और साधना के लिए अयोग्य व्यक्तियों के लक्षणों को शास्त्रकारों ने इस प्रकार स्पष्ट किया है -

ऐसा व्यक्ति जो अपराधी - मनोवृत्ति का हो अथवा क्रूर , पापी , हिंसक हो , वह न तो दीक्षा पाने का अधिकारी है और न वह साधना में ही सफल हो सकता है । कारण कि उसकी तामसिक - मनोवृत्ति उसे सदैव अस्थिर और असंतुलित बनाए रखती है ।

इसी प्रकार बकवादी , कुतर्क करने वाला , मिथ्याभाषी , अहंकारग्रस्त , लोभी , लम्पट , विषयी , चोर , दुर्व्यसनी , परस्त्रीगामी , मूर्ख , जड़ - बुद्धि , क्रोधी , द्वेषलु , ईर्ष्या अथवा अतिमोह से ग्रस्त , शास्त्र निंदक , आस्थाहीन , दुराचारी , वंचक , पाखंडी और न साधना करने योग्य । ऐसे लोगों को जन्मजात पापी , अपवित्र , दुर्भाग्यग्रस्त और कुपात्र माना गया है ।

Thursday, December 23, 2010

क्या आप ऐसे शिष्य हैं?

शिष्य द्वारा अपने हृदय में गुरु को धारण करना ही पर्याप्त नहीं हैं, अपितु यह तो प्रारंभ मात्र हैं –
“यह उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि गुरु को कितने शिष्य याद करते हैं? यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं,  कि “गुरु” शब्द को कितने शिष्यों ने अपने हृदय पटल पर अंकित किया हैं?
"यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि कितने शिष्य गुरु सेवा करने की कामना अपने दिल में रखते हैं?
"यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि कितने शिष्य गुरु की प्रसन्नता हेतु सचेष्ठ हैं?”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु कितने शिष्यों को याद करता हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु के होंठों पर कितने शिष्यों का नाम आता हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि कितने शिष्यों के नाम गुरु के हृदय पटल पर खुदे होते हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु ने किस शिष्य की सेवा स्वीकार की हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु किस शिष्य पर प्रसन्न हुआ हैं!”

और गुरु के होंठों पर शिष्य का नाम उच्चारित हो, गुरु के हृदय पटल पर शिष्य का नाम अंकित हो, गुरु सेवा का अवसर प्राप्त हो तथा शिष्य के कार्यों से गुरु प्रसन्न हो, यह शिष्य जीवन का परम सौभाग्य हैं  तथा  प्रत्येक शिष्य की यही प्राथमिक इच्छा होती हैं! जिस शिष्य को ऐसा दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त होता हैं, वह देव तुल्य हो जाता हैं, उसके जीवन से सभी पाप, दुःख, पीड़ा, समस्याएं आदि दूर हो  जाती हैं, अणिमादि सिद्धियाँ उसके सामने नृत्य करती हैं, उसका व्यक्तित्व करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजस्वी हो जाता हैं! गुरु सेवा कोई आवश्यक नहीं हैं, की शारीरिक रूप से गुरु गृह में रहकर ही सम्पन्न की जायें, अपितु महत्वपूर्ण गुरु सेवा यह हैं, कि शिष्य कितना अधिक गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान के द्वारा लोगों को लाभान्वित करता हैं तथा कितने अधिक लोगों को गुरु से जोड़ने का कार्य करता हैं, निःस्वार्थ, निष्कपट भाव से!

जब गुरुदेव जन्मे, धरती बन गयी गोद,
हो उठा पवन चंचल झूलना झूलाने कोl
भौरों ने दिशि दिशि गूँज बजायी शहनाई
आई सुहागिनी कोयल सोहर गाने कोl

करुणा ने चूमा भाल, दिया आशीर्वाद,
पीड़ा ने शोधी राशि, प्रेम ने धरा नामl
जय हो रूपा के पुत्र - घोष कर उठी बीन,
अम्बर उतरा आँगन में करने को प्रणामll

दर्शन ने भेंटी दृष्टि, भावना ने भाषा,
सूरज ने आभा-ओज, नदी ने गति प्रवाहl
सुन्दरता ने दर्पण, पूजाओं ने अर्चन,
बन गया हृदय आकर खुद ही सागर अथाहll

कल्पना पकड़ कर साथ खेलने लगी,
होने लगे उन्मुक्त लगे रहस्य के दृढ कपाटl
कांपने लगा अपवर्ग, सिहरने लगा स्वर्ग,
न्यौछावर हो हो गयी मनुज संस्कृति विराटll

मिल गयी राग को देह, आंसुओं को वाणी,
पा गया सत्य आकर, हो गया असत क्षीणl
निर्गुण बन गया सगुन, स्वरवती हुयी वसुधा,
हंस उठी प्रकृति ज्यों दीपक में बाती नवीनll

फिर एक दिवस सोलह रत्नों का हार पहन,
बांसुरी बजाता निकला जब वह सिरजनहारl
प्रकृति ठगी रह गयी, चकित भय गगन,
ज्यों बूँद बहक जायें छू पुरवाई बयारll

राधा सी जग की गली गली झूमने लगी,
तन्मय हो गया विश्व सारा ज्यों वृन्दावनl
तट-पनघट सब बन गए एक नव बंशीवट,
गूंजे गीत हवा में, खिले कुसुम उपवन उपवन ll

बालक दौड़ने लगे पीछे होकर विमुग्ध,
रवि का अनुमान जिस तरह करता हैं प्रकाशl
वृद्धों ने उठकर शिर मंगल तिलक दिया,
सावन का वन्दन करता हैं ज्यों जेठ मॉसll

संतों ने गीत सुना मन में सोचने लगे,
यह गीत कि या कोई नवयुग की गीता हैंl
हैं शब्द शब्द उपनिषद और श्रुति तान तान,
दर्शन तो जैसे उज्जवल गंग पुनीत हैंll

सब और हर्ष ही हर्ष, विमर्श न रहा शेष,
हो गए अस्त दुःख-दैन्य-दाह-तन-रोग-शोकl
पर देख धरा का यह उत्कर्ष-कीर्ति-वैभव,
जल उठा ईर्ष्या से सबका सब देवलोकll

Monday, December 20, 2010

यन्त्र मन्त्र तन्त्र

भारतीय समाज में यन्त्र मन्त्र और तन्त्र के मामले में बहुत बुरी भ्रान्तियां फ़ैल चुकी है.मीडिया सीधे रूप से किसी मन्त्र का जाप करने वाले या किसी प्रकार से वैदिक मन्त्र आदि का जाप करने वाले को तान्त्रिक उपाधि देकर उसकी मन चाही हँसी उडवाने से नही चूकता है.अगर इन तीनो वैदिक शब्दों की पूरी तरह से व्याख्या की जावे तो जो सामने अर्थ आता है वह अनर्थ के रूप में नही लिया जावे.कितने ही लोगो ने इस प्रकार की धारणाओं के प्रति अपनी आस्था वैदिक या धर्म से निकल कर फ़ूहडपन की तरफ़ ले जाने की कोशिश की है,लेकिन इसका आस्तित्व आज तक बरकारा है

मैं हूँ उनके साथ

मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll
कभी नहीं जो तज सकते हैं अपना न्यायोचित अधिकार l
कभी नहीं जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार ll
एक अकेले हो या उनके साथ खड़ी हो भरी भीड़ l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

निर्भय होकर घोषित करते जो अपने उदगार विचार l
जिनकी जिह्वा पर होता हैं, उनके अंतर का अंगार ll
नहीं जिन्हें चुक कर सकती हैं आतताइयों की शमशीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता l
ऊँचे से ऊँचे सपने को देते रहते जो न्यौता ll
दूर देखती जिनकी पैनी आंख भविष्य का तम चीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जो अपने कन्धों से पर्वत से अड़ टक्कर लेते हैं l
पथ की बाधाओं को जिनके पांव चुनौती देते हैं ll
जिनको बांध नहीं सकती हैं लोहे की बेडी जंजीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लुका धर कर l
हार जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर ll
कूद उदधि में नहीं पलट फिर ताका करते तीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जिनको यह अवकाश नहीं हैं, देखे कब तारे अनुकूल l
जिनको यह परवाह नहीं हैं कब तक भद्रा कब दिक्शुल ll
जिनके हांथों की चाबुक से चलती हैं उनकी तक़दीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

CopyRights: हरिवंशराय बच्चन, India.

Monday, December 13, 2010

गुरु सेवा

गंगा नदी के किनारे स्वामी जी का आश्रम था! स्वामी जी की दिनचर्या नियमित थी, जो प्रातः काल स्नान से प्रारंभ होती थी! उनके सभी शिष्य भी जल्दी उठकर अपने कार्यों से निवृत्त होते और फिर गुरु सेवा में लग जाते! उनके स्नान-ध्यान से लेकर अध्यापन कक्ष की सफाई व आश्रम के छोटे-मोटे कार्य शिष्यगण ही करते थे!
            एक सुबह स्वामी जी एक संत के साथ गंगा-स्नान कर रहे थे! तभी स्वामीजी अपने शिष्य को गंगाजी में खड़े-खड़े ही आवाज लगायी! शिष्य दौड़ा-दौड़ा चला गया!
स्वामीजी ने उससे कहा : "बेटा! मुझे गंगाजल पीना हैं!"

शिष्य आश्रम के भीतर से लोटा लेकर आया और उसे बालू से मांजकर चमकाया! फिर गंगाजी में उतरकर पुनः लोटा धोकर गंगाजल भरकर गुरूजी को थमाया! स्वामी जी ने अंजलि भरकर लोटे से जल पिया!

इसके बाद शिष्य खली लोटा लेकर लौट गया!

यह सब देखकर साथ नहा रहे संत ने हैरान होते हुए पूछा :"स्वामी जी जब आपको गंगाजल हांथों से ही पीना था तो शिष्य से व्यर्थ परिश्रम क्यों करवाया? आप यहीं से जल लेकर पी लेते!"
इस पर स्वामी जी बोले : "यह तो उस शिष्य को सेवा देने का बहाना भर था! सेवा इसीलिए दी जाती हैं की व्यक्ति का अंत:करण शुद्ध हो जाये और वह विद्या का सच्चा अधिकारी बन सके, क्योंकि बिना गुरु सेवा के शिक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती!

चाणक्य नीति में कहा गया हैं की जिस प्रकार कुदाल से मनुष्य जमीन को खोदकर जल निकल लेता हैं उसी प्रकार गुरु की सेवा करने वाला शिष्य गुरु के अंतर में दबी शिक्षा को प्राप्त कर सकता हैं!

Sunday, December 12, 2010

जैसी रही भावना जिसकी

एक प्रसिद्द वेश्यालय था, जो किसी मंदिर के सामने ही स्थित था. वेश्यालय में नित्य प्रति गायन-वादन-नृत्य आदि होता रहता था, जो की वह वेश्या अपने ग्राहकों की प्रसन्नता के लिए प्रस्तुत करती थी और बदले में बहुत सारा धन व कीमती उपहार उनसे प्राप्त करती थी. इस प्रकार उसकी समस्त भौतिक इच्छाएं तो पूर्ण थी, लेकिन कठोर मनुवादी व्यवस्था के अंतर्गत उसका मंदिर में प्रवेश वर्जित था और उसे वहां पूजा-पाठ आदि करने की अनुमति नहीं थी. वेश्यालय में तो उसे ग्राहकों से ही फुर्सत नहीं थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार देव पूजन संपन्न कर सकें. उसके मन में एक ही इच्छा शेष रह गयी थी, कि वह किसी प्रकार मंदिर में स्थापित देव मूर्ति का दर्शन कर ले और धीरे-धीरे समय के साथ उसकी यह इच्छा एक प्रकार की व्याकुलता में बदल गयी. जब मंदिर में आरती के समय बजने वाली घंटियों की आवाज उसके कानों में पड़ती, तो वह अत्यंत व्यग्र हो उठती, उसका हृदय रूदन कर उठता और भगवान् दर्शन की उत्कंठा उसके नेत्रों से बरसने लगती.

वेश्या के गायन-नृत्य आदि की स्वर लहरिया मंदिर तक भी पहुंचती थी. मंदिर का पुजारी कभी तो अत्यंत क्रोधित होता, कि उस नीच कर्मों में रत स्त्री की आवाज़ से मंदिर के वातावरण की पवित्रता में विघ्न उपस्थित हो रहा हैं और कभी वासना के वशीभूत उसी वेश्या के आगोश में पहुँच कर उसके रूप-रस का पान करने की कल्पना में डूब जाता, लेकिन मनुवादी स्समजिक मर्यादा के कारन ऐसा संभव नहीं था.
संयोगवश उस वेश्या और पुजारी, दोनों की मृत्यु एक ही समय हुयी. यमराज उस पुजारी को नरक के द्वार पर छोड़ कर वेश्या को स्वर्ग की और ले जाने लगे.

पुजारी को इस पर बहुत क्रोध आया और उसने यमराज से पूछा – “मैं जीवन भर मंदिर में देव मूर्तियों का पूजन करता रहा, फिर भी मुझे  नरक में जगह दी जा रही हैं और यह वेश्या जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रही, फिर भी इसे स्वर्ग ले जाया जा रहा हैं. ऐसा क्यों?”
यमराज ने उत्तर दिया – “देव मूर्तियों की पूजा करते हुए भी तुम्हारा चित्त सदा इस वेश्या में ही लगा रहा, जबकि पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए भी इसका चित्त देव मूर्ति में ही लगा रहा. यही वजह हैं, कि इसे स्वर्ग मिल रहा हैं और तुम्हें नरक.”

वस्तुतः कर्म के साथ विचारों का भी जीवन में अत्यधिक महत्त्व हैं. जब तक चित्त वेश्यागामी रहेगा (अर्थात भौतिक भोगों में लिप्त रहेगा), तब तक देव पूजन, जप, साधना आदि के उपरांत भी स्वर्ग (अर्थात देवत्व. श्रेष्ठता, सफलता, पूर्णता) की प्राप्ति संभव नहीं हैं.
किसी साधना आदि में असफलता प्राप्त होने के पीछे कारन ही यही होता हैं, कि कहीं न कहीं उसके विश्वास, श्रद्धा, समर्पण आदि में न्यूनता रहती हैं एवं चित्त साधनात्मक चिंतन से न्यून हो कर भोगेच्छाओं में लिप्त होता हैं.

अतः साधक का यह पहला कर्त्तव्य हैं, कि वह प्रतिक्षण गुरु या इष्ट चिंतन करता हुआ, मन को नियंत्रित करें, तभी श्रेष्ठता की और अग्रसर होने की क्रिया संभव हो पायेगी.

गुरु मंत्र से सिद्धि

कालिदास विश्व के विख्यात कवि थे, परन्तु प्रारंभ में ये सर्वथा मूर्ख, निरक्षर व अबोध व्यक्ति थे, जब पत्नी ने महल से धक्का देकर उन्हें  बाहर निकल दिया तो संयोगवश मार्ग में ही विख्यात योगी कालीचरण मिल गए, उन्होंने साधना के बल पर सब कुछ जान लिया, बोले : "तुम निरक्षर हो, अतः साधना तो कर नहीं सकते पर मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाकर 'गुरु मंत्र' दे देता हूँ और यदि निरंतर गुरु सेवा और गुरु मंत्र जप करोगे तो निश्चय ही तुम जीवन में वह सब कुछ पा सकोगे जो कि तुम्हारा अभीष्ट हैं."

युवक कालिदास ने गुरु की बात अपने हृदय में उतार ली और निरंतर गुरु मंत्र का जप करने लगा,वह सोते, बैठते, उठाते, जागते, खाते, पीते गुरु का ही चिंतन करता, गुरु उसके इष्ट और भगवान बन गए, सामने कलि की मूर्ति में भी उसे गुरु के दर्शन होते, गुरु को उदास देखकर वह झुंझला जाता, गुरु को प्रसन्न मुद्रा में देखकर वह खिल उठता, चौबीस घंटे वह गुरु के ध्यान में ही डूबा रहता और इसी प्रयत्न में रहता कि गुरु उसे आज्ञा दे और वह प्राणों की बजी लगाकर भी उसे पूरा करे, वह हर क्षण ऐसे मौके की तलाश में रहता, जब उसे गुरु सेवा करने का अवसर प्राप्त हो सके.

इस प्रकार कालिदास ने अपने आपको पूरी तरह से गुरुमय बना दिया था. 90 दिन के बाद स्वामी कालीचरण ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर "शाम्भवी दीक्षा" दी और ऐसा होते ही उसके अन्तर का ज्ञान दीप प्रदीप्त हो उठा, कंठ से वाग्देवी प्रगट हुयी और स्वतः काव्य उच्चरित होने लगा.

आगे चलकर बिना अन्य कोई साधना किये केवल गुरु साधना और शाम्भवी दीक्षा के बल पर कालिदास अद्वितीय कवि बन कुमार संभव,मेघदूत और ऋतुसंहार जैसे काव्य ग्रंथों की रचना कर विश्व विख्यात बन सकें.