Monday, December 19, 2011

True life

True life means the ability to give up all one has. One should be filled with a craziness, a zeal ...... and one who has no such enthusiasm is nothing but ice. Such a life cannot be like a swift flowing river. A limited, restricted existence is meaningless.

Sunday, December 18, 2011

Disciple's Life

Life means separation...... and only after he has been separated from his loving master can a disciple gain the eagerness to rush and fuse himself totally in the Guru. One needs a fervour, an enthusiasm, an eagerness in one's heart to get up and rush to the Guru.

Tuesday, December 06, 2011

Guru

One who can give everything, one who can bestow totality, one who can transform a gain of sand that is the disciple into a universe, one who can transform a drop of water into elixir showering cloud is the Guru.

Monday, May 30, 2011

Prayers

Prayers and speaking out one's feelings to the Lord is a medium of making the mind pure. It helps get rid of evil thoughts.

Thursday, May 26, 2011

Devotion

Devotion to God does not mean giving up things. Devotion means the flowering of all one's capabilities. True religion never tells a person to give up worldly duties. Religion asks a person to get rid of mental disturbance, moral wrongs and ignorance.

Thursday, May 05, 2011

suffer sorrows and pain

There is no more a happy person than a Sadhak in this world. A common person is ignorant. Ignorance leads to egotism. Egotism generates fear. Fear leads to confusion. Confusion is there because man has many wishes. And most wishes are there because man desires pleasure. It is due to indulgence in pleasures that a person develops traits. It is due to these traits that a person has to take birth again and again and has to suffer sorrows and pain.

Wednesday, May 04, 2011

दिव्य युग

ओम ब्रम्हा वे दिवौ ह: स: दिवौ ।
वे गुरु वे सदा ह: ।।


इश घोर संक्रमण काल मैं
जब मानव दिग्भ्रमित है
तुम पाथेय बनो ।
जब वे खोखली सभ्यता से दिशासुन्ये हैं
तुम मार्ग दर्शक बनो
जब वे आसुरी परवर्तीयों में लिप्त हैं
तुम साधनाताम्क परकाश से सुनय्ता भरो ।
छा जाओ पूरी पृथ्वी पर, और साधना
के द्वारा सह्श्त्रार जाग्रत कर
प्राणमय कोष से
धरा पर सिद्धाश्रम प्रेरित दिव्य युग स्थापित करो ।

Monday, May 02, 2011

हर पल निखिल

गुरुवर शरण, गुरुवर शरण, गुरुवर शरण गहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

गुरुवर शरण, गुरुवर शरण, गुरुवर शरण गहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

जिस देश में, जिस भेष में रहो | जिस देश में |
जिस देश में, जिस भेष में रहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

गुरुवर शरण, गुरुवर शरण, गुरुवर शरण गहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

जिस ध्यान में, जिस स्थान में रहो | जिस ध्यान में |
जिस ध्यान में, जिस स्थान में रहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

गुरुवर शरण, गुरुवर शरण, गुरुवर शरण गहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

जिस योग में, जिस भोग में रहो | जिस योग में |
जिस योग में, जिस भोग में रहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

गुरुवर शरण, गुरुवर शरण, गुरुवर शरण गहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |
हर पल निखिल, हर पल निखिल, हर पल निखिल कहो |

Friday, April 15, 2011

Devotion

Devotion to God does not mean giving up things. Devotion means the flowering of all one's capabilities. True religion never tells a person to give up worldly duties. Religion asks a person to get rid of mental disturbance, moral wrongs and ignorance.

Thursday, April 14, 2011

Be yourself

The mind of the Sadhak is like the tree Kalptaru that fulfills all wishes. The thoughts that rise in the mind can be converted into power of the soul. If the mind of the Sadhak is full of fearlessness, hope, confidence and kindness then he gets all boons in life. But if he becomes afraid of adverse circumstances then he loses confidence and destroys his own chances of success.

Sunday, April 03, 2011

Spiritual force

The whole world and the universe are run by a spiritual force. The sun and the moon, the stars and the constellations all keep moving under some invisible divine influence. The various divine worlds namely Bhu, Bhav, Swa, Mah, Jan, Tap and Satya all continue to exist due to some basic spiritual force. And that basic spiritual force is the highly revered Yogiraaj Swami Sachchidanand - the Vedas too have accepted this fact.
   

Remember those days

"Kisi na kisi jeevan me kabhi na kabhi tumse jaroor vada kiya hoga ki mai tumhe amratva ka pan karaunga, Siddhashram ki pawan dharti par tumhare pair utarunga or Brahamma se sakshatkar karaunga. Tum hans ho or mujhe apna vada yaad hai ki mai tumhe is mansarowar me gahari dubki lagana sikhaunga. Mai tumhare pankho me gati gunga or nirabh aakash me sudoor uchai par udne ki jankari dunga or tumhare sare dukh, dard, daniye abhav, vishamta or kasht mitakar purnta dunga or isi vade ko nibhane ke liye mai is dharti par aaya hu or aawaj de raha hu tumhe apne pas bulane ke liye ki jis-se mere dwara kiya gaya vada pura ho sake."

Param Pujya Swami Nikhileshwaranand Jee Maharaj

Thursday, February 17, 2011

परमात्मा

जब मैं पहली बार सिद्धाश्रम गया, तब सिद्धाश्रम एक श्मशान की तरह था! वहां देखा – सन्यासी साधना कर रहे हैं.... आँखे बंद किये हुए बैठे हैं..... कोई हंसी नहीं.... कोई खिलखिलाहट नहीं! मैंने पहली बार कहा कि ऐसा सिद्धाश्रम नहीं चल सकता, इस सिद्धाश्रम में कुछ उमंग होनी चाहिए, कुछ मस्ती होनी चाहिए! और वहां के शिष्य आज भी इंतज़ार करते हैं कि कब निखिलेश्वरानंद जी आयें और यहाँ पाँव रख दे! वहां की माटी को लेकर कब चन्दन की तरह ललाट पर लगाएं... इंतज़ार करते रहते हैं! वे कई बार कहते हैं, कि आपके रस्ते को ताकते-ताकते तो हमारी आँखों में झाइयां पड़ने लगी हैं, आप कब आयेंगे?

मुझे तो वे उच्चकोटि के योगी भी अत्यंत प्रिय हैं, उन सन्यासी शिष्यों को उच्चकोटि की साधना सिखानी पड़ती हैं, अपना एक प्रखर और धारदार रूप उनके सामने रखना पड़ता हैं और गृहस्थ शिष्यों के बीच बिलकुल बालक बनकर भी बात करता हूँ!... और नहीं समझ पाओगे तुम मुझे.... ब्रह्मा को कोई बांध भी नहीं पाया हैं, ब्रह्म को कोई समझ भी नहीं पाया हैं... और मैं ठीक कह रहा हूँ कि तुम मुझे समझ भी नहीं पाओगे! जिस दिन मैं चला जाऊंगा, उस दिन तुम्हारे हिस्से में आंसुओं के अलावा कुछ बाकी नहीं रहेगा!

तुम मुझसे जुदाई सहन नहीं कर सकते, एक क्षण भी मुझसे अलग नहीं रह सकते, क्योंकि मेरी सुगंध को तुमने एहसास किया हैं!

Tuesday, January 25, 2011

Fire Aim Ready (Fire again if needed)

What the heck is this? This is a rule I follow. Why?
because if there were time to get ready then aim and then shoot, then you are in Olympics competition but not in real life. In real life we need quick action without much thinking and planning in most of the cases, to succeed.


Although planning is needed and it gives you results, when you know "the results". The people who release the alfa, beta or RC of a software or website, they follow this rule unknowingly. So they finally release the stable version after a few revisions. Similarly if you are waiting for some 100% thing to start something you are going to wait for a life time. Because nothing is 100 % perfect in a sense of materialistic world other than God and His creations. And He is still improving His creations.

मंत्र शक्ति

भगवान् राम के पूर्वज सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन का एक प्रसंग है - एक बार लंका नरेश रावण, राजा हरिश्चंद्र की तपश्चर्या से प्रभावित होकर उनके दर्शन करने आया।

राजमहल के द्वार पर पहुंचकर रावण ने द्वारपाल को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा - 'मैंने राजा हरिश्चंद्र की तपस्या और मंत्र साधना के विषय में काफी प्रशंसा सूनी है, मैं उनसे कुछ सीखन की कामना लेकर आया हूं।'

द्वारपाल ने रावण को उत्तर दिया - 'हे भद्र पुरूष! आप निश्चय ही हमारे राजा से मिल सकेंगे, किन्तु अभी प्रतीक्षा करनी होगी, क्योंकि अभी वे अपनी साधना कक्ष में साधना, उपासना आदि कर रहे हैं।'

कुछ समय बाद द्वारपाल रावण को साथ लेकर राजा के पास गया। रावण ने झुककर प्रणाम किया और राजा हरिश्चंद्र से अपने मन की बात कही, की वह उनसे साधनात्मक ज्ञान लाभ हेतु आया है।

वार्तालाप चल ही रहा था, की एकाएक राजा हरिश्चंद्र का हाथ तेजी से एक ओर घुमा। पास रखे एक पात्र से उन्होंने अक्षत के कुछ दानें उठाएं और होठों से कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाते हुए बड़ी तीव्रता से एक दिशा में फ़ेंक दिए। रावण एकदम से हतप्रभ रह गया, उसने पूछा -

'राजन! यह आपको क्या हो गया था?'

राजा हरिश्चंद्र बोले - 'यहां से १४० योजन दूर पूर्व दिशा में एक हिंसक व्याघ्र ने एक गाय पर हमला कर दिया था, और अब वह गाय सुरक्षित है।' रावण को बड़ा अचरज हुआ, वह बिना क्षण गवाएं इस बात को स्वयं जाकर देख लेना चाहता था। चलते-चलते रावण जब उस स्थल पर पहुंचा, तो देखा की रक्तरंजित एक व्याघ्र भूमि पर पडा है। व्याघ्र को अक्षत के वे दाने तीर की भांति लगे थे, जिससे वह घायल हुआ था। राजा हरिश्चंद्र की मंत्र शक्ति का प्रमाण रावण के सामने था।

आज भी मंत्रों में वही शक्ति है, वही तेजस्विता है, जो राजा हरिश्चंद्र के समय थी। आवश्यकता है, तो मनःशक्ति को एकाग्र करने की, पूर्ण दृढ़ता के साथ मंत्रों का ह्रदय से उच्चारण करने की।

Monday, January 24, 2011

समर्पण Ashwatthama

Ashwatthama in Javanese
Wayang
कथा महाभारत के युद्ध की है| अश्वत्थामा ने अपने पिता की छलपूर्ण ह्त्या से कुंठित होकर नारायणास्त्र का प्रयोग कर दिया| स्थिति बड़ी अजीब पैदा हो गई| एक तरफ नारायणास्त्र और दुसरी तरफ साक्षात नारायण| अस्त्र का अनुसंधान होते ही भगवान् ने अर्जुन से कहा - गांडीव को रथ में रखकर नीचे उतर जाओ ... अर्जुन ने न चाहते हुए भी ऐसा ही किया और श्रीकृष्ण ने भी स्वयं ऐसा ही किया| नारायणास्त्र बिना किसी प्रकार का अहित किए वापस लौट गया, उसने प्रहार नहीं किया, लेकिन भीम तो वीर था, उसे अस्त्र के समक्ष समर्पण करना अपमान सा लगा| वह युद्धरथ रहा, उसे छोड़कर सभी नारायणास्त्र के समक्ष नमन मुद्रा में खड़े थे| नारायणास्त्र पुरे वेग से भीम पर केन्द्रित हो गया| मगर इससे पहले कि भीम का कुछ अहित हो, नारायण स्वयं दौड़े और भीम से कहा - मूर्खता न कर! इस अस्त्र की एक ही काट है, इसके समक्ष हाथ जोड़कर समर्पण कर, अन्यथा तेरा विध्वंस हो जाएगा|

भीम ने रथ से  नीचे उतर कर ऐसा ही किया और नारायणास्त्र शांत होकर वापस लौट गया, अश्वत्थामा का वार खाली गया|

यह प्रसंग छोटा सा है, पर अपने अन्दर गूढ़ रहस्य छिपाये हुए है ... जब नारायण स्वयं गुरु रूप में हों, तो विपदा आ ही नहीं सकती, जो विपदा आती है, वह स्वयं उनके तरफ से आती है, इसीलिए कि वह शिष्यों को कसौटी पर कसते है ... कई बार विकत परिस्थियां आती हैं और शिष्य टूट सा जाता है, उससे लड़ते| उस समय उस परिस्थिति पर हावी होने के लिये सिर्फ एक ही रास्ता रहता है समर्पण का ... वह गुरुदेव के चित्र के समक्ष नतमस्तक होकर खडा हो जाए और भक्तिभाव से अपने आपको गुरु चरणों में समर्पित कर दे और पूर्ण निश्चित हो जाए ... धीरे धीरे वह विपरीत परिस्थिति स्वयं ही शांत हो जायेगी ... और फिर उसके जीवन में प्रसन्नता वापस आ जायेगी|