Thursday, February 17, 2011

परमात्मा

जब मैं पहली बार सिद्धाश्रम गया, तब सिद्धाश्रम एक श्मशान की तरह था! वहां देखा – सन्यासी साधना कर रहे हैं.... आँखे बंद किये हुए बैठे हैं..... कोई हंसी नहीं.... कोई खिलखिलाहट नहीं! मैंने पहली बार कहा कि ऐसा सिद्धाश्रम नहीं चल सकता, इस सिद्धाश्रम में कुछ उमंग होनी चाहिए, कुछ मस्ती होनी चाहिए! और वहां के शिष्य आज भी इंतज़ार करते हैं कि कब निखिलेश्वरानंद जी आयें और यहाँ पाँव रख दे! वहां की माटी को लेकर कब चन्दन की तरह ललाट पर लगाएं... इंतज़ार करते रहते हैं! वे कई बार कहते हैं, कि आपके रस्ते को ताकते-ताकते तो हमारी आँखों में झाइयां पड़ने लगी हैं, आप कब आयेंगे?

मुझे तो वे उच्चकोटि के योगी भी अत्यंत प्रिय हैं, उन सन्यासी शिष्यों को उच्चकोटि की साधना सिखानी पड़ती हैं, अपना एक प्रखर और धारदार रूप उनके सामने रखना पड़ता हैं और गृहस्थ शिष्यों के बीच बिलकुल बालक बनकर भी बात करता हूँ!... और नहीं समझ पाओगे तुम मुझे.... ब्रह्मा को कोई बांध भी नहीं पाया हैं, ब्रह्म को कोई समझ भी नहीं पाया हैं... और मैं ठीक कह रहा हूँ कि तुम मुझे समझ भी नहीं पाओगे! जिस दिन मैं चला जाऊंगा, उस दिन तुम्हारे हिस्से में आंसुओं के अलावा कुछ बाकी नहीं रहेगा!

तुम मुझसे जुदाई सहन नहीं कर सकते, एक क्षण भी मुझसे अलग नहीं रह सकते, क्योंकि मेरी सुगंध को तुमने एहसास किया हैं!

1 comment:

  1. it is the voice of supreme.veteran voice for god.

    ReplyDelete