Wednesday, May 04, 2011

दिव्य युग

ओम ब्रम्हा वे दिवौ ह: स: दिवौ ।
वे गुरु वे सदा ह: ।।


इश घोर संक्रमण काल मैं
जब मानव दिग्भ्रमित है
तुम पाथेय बनो ।
जब वे खोखली सभ्यता से दिशासुन्ये हैं
तुम मार्ग दर्शक बनो
जब वे आसुरी परवर्तीयों में लिप्त हैं
तुम साधनाताम्क परकाश से सुनय्ता भरो ।
छा जाओ पूरी पृथ्वी पर, और साधना
के द्वारा सह्श्त्रार जाग्रत कर
प्राणमय कोष से
धरा पर सिद्धाश्रम प्रेरित दिव्य युग स्थापित करो ।

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